12t Hindi Question

पंच परमेश्वर कहानी का पूरा सारांश


पंच परमेश्वरप्रेमचन्द की लिखी कहानी हैयह उनकी पहली कहानी है, जो 1916 में लिखी गयी थी। 

जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में मित्रता थी उन दोनों के विचार मेल खाते थेउनकी मित्रता लेनदेन में साझेदारी की थी उन दोनों में परस्पर विश्वास था जुम्मन शेख हज करने गया अपने घर की देखरेख उसने अलगू पर छोड़ रखी थीअलगू चौधरी भी ऐसा ही करता था बचपन से ही उन दोनों में मित्रता थी जुम्मन के पिता जुमराती ही दोनों के शिक्षक थे। जुम्मन का मान विद्या के कारण होता तो अलगू का सम्मान धन के कारण होता था। 

एक बार ऐसी घटना होती है कि दोनों की मित्रता टूटने लगीजुम्मन की बूढी खाला ने पंचायत बुलायी उसकी सम्पत्ति जुम्मन को मिलने के बावजूद उसकी सेवा ठीक से नहीं हो रही थीजुम्मन की बीबी करीमन तीखा बोलती थी जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेजतीखे सालन भी देने लगी जुम्मन शेख भी निष्ठर हो गएअब बेचारी खालाजान को प्रायः नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं।” 

दूसरी तरफ जुम्मन के अपने तर्क थे ‘बुढ़िया जाने कब तक जिएगीदोतीन बीघे ऊसर क्या दे दिया, मानो मोल ले लिया बघारी दाल के बिना रोटियाँ नहीं उतरतीं। जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से तो अब तक गाँव मोल ले लेते

 अलगू पंच बनाए गए । बूढी खाला ने कहा—’बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?’ अलगू उधेड़बून में फंस जाता है। ‘हमारे सोये हुए धर्म, ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाए, तो उसे खबर नहीं होती, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। फिर उससे कोई कह नहीं सकता।’ अलगू बार-बार सोचता क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहोगे‘ 

बूढी खाला पंचायत से कहती हैमुझे पेट को रोटी मिलती है, तन का कपड़ाबेकस बेवा हूँकचहरीदरबार नहीं कर सकतीतुम्हारे सिवा और किसको अपना दु:सुनाऊँ ? तुमलोग जो राह निकाल दो उसी पर चलूँ ” 

अलगू चौधरी पंच थेउन्होंने हिब्बनामा रद्द करने का फैसला दिया खाला को मिलकियवापस करने का फैसला दिया । 

फैसले को सुनकर जुम्मन शेख सन्नाटे में जाता है । 

शीघ्र ही एक दूसरी घटना में जुम्मन शेख को एक मौका मिलता है अलगू चौधरी और समझू साहू के बीच पंच बनने का_बटेसर मेले से अलगू चौधरी ने बड़े मजबूत बैल खरीदे थे एक बैल उसमें से मर जाता है अब एक बैल को लेकर अलगू क्या करता? उसने उसे मझू साहू के हाथ बेच दियासाहू उससे बेगारी लेता था खूब पिटाई भी करता थाचारा खाने को भरपेट नहीं देता थासड़क पर बैल गिर पड़ता हैवहीं रात काटनी पड़ती हैलेकिन किसी समय पलक झपक जाने पर किसी ने आंटी से रुपये ही नहीं गायब कर दिए, कई कनस्तर तेल भी नदारत सहुआइन इन सबके लिए अलगू चौधरी को कोसती हैनिगोड़ा ऐसा कुलच्छनी बैल देता, जन्म भर की कमाई लुटती

 अब अलगू चौधरी के बैल का दाम समझू साहू देने से इनकार कर देता है गाँव में पंचायत बैठती है इस बार दृश्य बदल जाता है अलगू वादी है और जुम्मन पंच । 

 जुम्मन शेख के मन में जिम्मेवारी का भाव पैदा होता है वह बदला लेने की भावना मिटा देता है जुम्मन सोचता हैमैं इस वक्त न्याय 

और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँमेरे मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा वह देववाणी के सदृश होगा और देववाणी में मेरे मनोविकारों का कदापि समावेश होना चाहिए मुझे सत्य से जौ भर भी टलना उचित नहीं___ अन्त में जुम्मन ने फैसला सुनायाअलगू और समझू साहू समझू साहू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दे. सभी प्रसन्न हुएपंच परमेश्वर की जय ‘ 

इसे कहते हैं न्याय ! यह मनुष्य का काम नहीं, पंच में परमेश्वर वास करते हैंयह उन्हीं की महिमा है। 

पंच के सामने खोटे को कौन खरा कह सकता है

थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आये गले मिलकर बोलेभैया, जब तुमने मेरी पंचायत की तब से मैं तुम्हारा प्राणघातक शत्रु बन गया था पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठकर कोई किसी का दोस्त है, दुश्मन न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है अलगू रोने लगाउसकी आँख से निकले इस पानी से दोनों के दिलों का मैधुल गयामित्रता की मुरझायी हई लता फिर हरी हो गयी। 

पंच परमेश्वरप्रेमचंद की प्रारंभिकाल की कहानी होकर भी अत्यन्त कौतूहलवर्द्धक कहानी हैयह समाज में न्याय की भावना का संचार करती है

जीवन का झरना कविता का भावार्थ ( Jivan Ka Jharna Kavita Poem ka bhawarth )


महाकवि आरसी प्रसाद सिंह ने जीवन का झरनाशीर्षक कविता में हमेशा गतिशील रहने का संदेश दिया है जीवन उस झरने के समान है जो अपने लक्ष्य तक पहुँचने की लगन लिए पथ की बाधाओं 

से मुठभेड़ करता बढ़ता ही जाता है गति ही जीवन है और स्थिरता मृत्यु । 

अतः मनुष्य को भी निर्झर के समान गतिमान रहना चाहिए

“जीवन और झरना” दोनों का स्वरूप और आचरण एक जैसा ही है । जिस प्रकार झरने के विषय में यह कहना कठिन है कि वह किस पहाड़ के हृदय से कब कहाँ क्यों फुट पड़ा । यह पहले किसी पतले से सोते के रूप में और फिर एक विशाल झरने के रूप में झरता हुआ समतल पर उतरकर दोनों किनारों के बीच एक विशाल नदी के रूप में बहने लगा । इसी प्रकार इस मानव जीवन में सहसा में नहीं कहा जा सकता है कि यह ‘मानव जीवन’ कब, कैसे, क्यों प्रारंभ हुआ, कब ध रती पर, मानवों के जीवन प्रवाह के रूप में उतर आया और सुख एवं दुःखों के दो किनारों के बीच निरंतर बहने लगा । 

निर्झर अपनी जलपूर्णता में पूरी गतिशीलता से युक्त रहता है । वैसी अवस्था में, जवानी में भी सत्यात्मकता ही एक मात्र स्वभाव होना चाहिए । जिस तरह झरना अपने मस्ती-पूर्णगान, कलकल निनाद और आगे बढ़ते जाने के अलावा अन्य कोई चिन्ता नहीं करता था लक्ष्य नहीं रखता, उसी तरह मनुष्य-जीवन का लक्ष्य सतत् विकास-पथ पर प्रगति करते जाना ही होना चाहिए। उसे अन्य तरह की चिन्ताओं में नहीं उलझना चाहिए । 

यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन में सुख-दुख दोनों को सहज भाव से अपनाते हुए हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए । हमें काम करने का उत्साह भर रहना चाहिए । आगे बढ़ने में विघ्न-बाधाएँ यदि आती हैं तो आएँ हम उनका जमकर सामना करें, उनपर काबू प्राप्त करें – और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चलें जैसा एक झरने की होती हैं । हमें भी वैसी मस्ती भरी रहनी चाहिए। 

कवि का कहना है कि निर्झर तथा जीवन दोनों के लिए गतिशीलता अनिवार्य है । जीवन में कर्म प्रगतिशीलता ही उसे सार्थकता तथा जीवनता का आकर्षण प्रदान करती है । अन्यथा जीवित अवस्था में होने के बावजूद मृत्यु बोधक स्थायित्व या ठहराव आ जायेगा । 

निर्झर का प्रवाह रुक जाने का मतलब है उसकी स्रोत बन्द हो चुकी है और वैसी अवस्था में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है । जीवन में भी कर्मगत गतिशीलता ही जीवन होने तथा सृष्टि अथवा संसार के विकास की मुख्य शर्त है । गतिशीलता के अवरुद्ध हो जाने या जीवन में ठहराव आ जाने का तात्पर्य संसार या जीवन के अस्तित्व पर ही खतरा होता है । ठहराव निर्झर तथा जीवन दोनों के लिए समान रूप से अंत या मृत्यु का सूचक होता है क्योंकि दोनों का समान धर्म है। 

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